मध्यप्रदेश के भोपाल में हुई दो दिन की ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट (GIS) में कुल 26 लाख करोड़ रुपए के निवेश प्रस्ताव मिले हैं। सरकार का दावा है कि ये प्रस्ताव जमीन पर उतरे तो 17 लाख रोजगार की संभावनाएं बनेंगी। दैनिक भास्कर की पड़ताल में सामने आया कि इनमें से 22% प्रस्ताव ही अगले दो साल में जमीन पर उतर सकते हैं, इनसे 16% रोजगार मिलने की संभावना है। इन प्रस्तावों से 5.93 लाख करोड़ का निवेश आने की उम्मीद है। वहीं, 78% प्रस्तावों को पूरा होने में 5 साल लगेंगे। यानी 2.68 लाख करोड़ के प्रस्ताव और 84% रोजगार तब मिलेगा, जब ये जमीन पर उतरेंगे। बता दें कि इस समिट के जरिए कुल 10 सेक्टर में 82 प्रस्ताव सरकार को मिले हैं। इनमें से 9 फीसदी यानी 2.45 लाख करोड़ निवेश 6 बड़े उद्योग समूहों का है। जिसमें अडाणी, अंबानी, अवादा, आदित्य बिरला ग्रुप और गोदरेज जैसे समूह शामिल हैं। भास्कर ने कैसे की पड़ताल… दैनिक भास्कर ने उद्योग विभाग के रिटायर्ड एडिशनल डायरेक्टर अजय चौबे, नगरीय विकास एवं आवास विभाग के रिटायर्ड इंजीनियर के के श्रीवास्तव, पीथमपुर औद्योगिक संगठन के अध्यक्ष गौतम कोठारी, उद्योग विभाग के ही एक रिटायर्ड एडिशनल डायरेक्टर और दो ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट का आयोजन करा चुके एक रिटायर्ड आईएएस अफसर से बात की। उद्योग विभाग के रिटायर्ड अधिकारी और रिटायर्ड आईएएस ने उनके नाम का खुलासा न करने का आग्रह किया। इनके सामने समिट में आए प्रस्तावों को रखा और उनसे इनकी हकीकत समझी। किस सेक्टर के निवेश प्रस्ताव जल्दी जमीन पर उतर सकते हैं और बाकी प्रस्तावों में कितना समय लगेगा। जानिए इस रिपोर्ट में… पहले जानिए, उन सेक्टर्स के बारे में जिनके प्रपोजल 2 साल में पूरे हो सकते हैं… 2-3 साल में पूरे होते हैं इस सेक्टर के प्रोजेक्ट इस सेक्टर में अवाडा, एक्सिस एनर्जी, टोरेंट पावर, जिंदल इंडिया जैसी 8 कंपनियों ने निवेश की इच्छा जताई है। कुल 5.72 लाख करोड़ के प्रस्ताव मिले हैं। भास्कर ने रिन्यूएबल एनर्जी के अपर मुख्य सचिव मनु श्रीवास्तव से बात की तो उन्होंने कहा कि इस सेक्टर के प्रोजेक्ट लगाने में अधिकतम 2-3 साल लगते हैं। जिन कंपनियों ने प्रोजेक्ट में निवेश की इच्छा जताई है, उनसे बिजली लेने का करार पूरा हो चुका है। इस बात की पूरी उम्मीद है कि अगले 6 महीने में सारे प्रोजेक्ट्स पर काम शुरू हो जाएगा। पीथमपुर औद्योगिक संगठन के अध्यक्ष गौतम कोठारी भी कहते हैं कि रिन्यूएबल एनर्जी के प्रोजेक्ट जल्दी पूरे होते हैं। ऐसे प्रोजेक्ट के लिए केवल जमीन की जरूरत होती है। हालांकि, कोठारी ने कहा कि इस सेक्टर में 1.4 लाख रोजगार का दावा किया गया है। जब प्रोजेक्ट का काम होगा, तभी इतने रोजगार की संभावना है। प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद इसमें ज्यादा रोजगार की संभावना नहीं होती। 70% प्रोजेक्ट धरातल पर उतर सकते हैं एमएसएमई सेक्टर में इंदौर और भोपाल की छोटी-छोटी कंपनियों ने रुचि दिखाई है। इनमें इंदौर की वर्की प्राइवेट लिमिटेड, नीले पानी की प्रौद्योगिकियां, डिटवी एक्सपोर्ट्स, इकोश्योर पल्प मोल्डिंग और फेलिक्स जेनरिक जैसी कंपनियां शामिल हैं। वहीं, भोपाल की भगवती तीरथ पॉलि कंटेनर्स, ईजीटेक इंटरप्राइजेज और नर्मदापुरम की आहारम मिल्स भी हैं। उद्योग विभाग से रिटायर्ड एक अधिकारी कहते हैं कि एमएसएमई का इन्वेस्टर पॉलिसी के दायरे में ही इन्वेस्ट करता है। जो बड़े उद्योग होते हैं, वो सरकार से निगोशिएशन कर सकते हैं। चाहे वह जमीन का मामला हो या फिर अन्य सुविधाओं का। वे कहते हैं कि सरकार को बड़े उद्योगों की बजाय छोटे उद्योगों को बढ़ावा देना चाहिए। छोटे उद्योगों में रोजगार की संभावनाएं ज्यादा होती है। बड़े उद्योगों में सारा काम मशीनों से होता है। उन्होंने कहा- एमएसएमई के 70 फीसदी प्रोजेक्ट जमीन पर उतर सकते हैं। इन्हें शुरू करने में जमीन की ज्यादा जरूरत नहीं होती। सरकार ने पहले से ही इनके लिए हर जिले में जमीन चिह्नित की हुई है। साथ ही जो पॉलिसी बनाई है, वो निवेशकों को आकर्षित करने वाली है। तीन महीने से दो साल में पूरे होंगे प्रोजेक्ट इस सेक्टर में इंदौर की डिजिटल कन्वर्जेंस टेक्नोलॉजी, ईएलसीआईएनए, केंस टेक्नोलॉजी और भोपाल की थोलोन्स, श्रीटेक और बियांड स्टूडियोज ने निवेश प्रस्ताव दिए हैं। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे का कहना है कि 6 अलग-अलग कैटेगरी में प्रपोजल मिले हैं। इन्हें पूरा होने में 3 महीने से 2 साल तक का समय लगेगा। अब जानिए, उन सेक्टर्स के बारे में जिनके प्रस्ताव 5 साल में पूरे होंगे… जल्दी काम करेंगे तो कॉस्ट नहीं बढ़ती इस सेक्टर में समदड़िया बिल्डर्स, टीम रीथिकिंग अर्बनिज्म प्राइवेट लिमिटेड, ट्रेजर ग्रुप, वैश्विक दुनिया, HYD टेक इंजीनियर्स, सचदेव ग्रुप ऑफ कंपनीज समेत कुल 10 इन्वेस्टर्स ने निवेश की इच्छा जताई है। इस सेक्टर में 1.97 लाख करोड़ के इन्वेस्टमेंट प्रपोजल मिले हैं। एक्सपर्ट के मुताबिक, शहरी विकास के प्रोजेक्ट 5 साल में जमीन पर दिखाई देने लगते हैं। सरकार केवल जमीन देती है, उसके बाद कंस्ट्रक्शन का काम कंपनी का होता है। वे ये भी कहते हैं कि ये कंपनियों पर निर्भर करता है कि वे कितनी जल्दी काम शुरू करती हैं। गोदरेज ने 450 करोड़ रुपए निवेश का प्रपोजल दिया एक्सपर्ट ये भी कहते हैं कि रियल एस्टेट और शहरी विकास में अब कॉर्पोरेट कंपनियां भी दिलचस्पी ले रही हैं। गोदरेज ने मप्र में मल्टीपल सेक्टर में 450 करोड़ रुपए निवेश का प्रपोजल दिया है। गोदरेज ग्रुप टाउनशिप प्रोजेक्ट में ज्यादा इन्वेस्ट कर सकता है। इंदौर में ग्रुप ने 206 करोड़ रुपए की 24 एकड़ जमीन का सौदा किया है। इससे पहले जुलाई 2024 में गोदरेज ग्रुप इंदौर-उज्जैन रोड पर 46 एकड़ की भूमि का अधिग्रहण कर चुका है। दो इन्वेस्टर्स समिट करा चुके रिटायर्ड आईएएस अधिकारी कहते हैं कि सरकार ने पिछले दिनों इंटीग्रेटेड टाउनशिप पॉलिसी लागू की है। इसका फायदा शहरी विकास के प्रोजेक्ट में काम करने वाले इन्वेस्टर्स को होगा। वे कहते हैं- ये बड़े पैमाने पर अप्रत्यक्ष रोजगार देने वाला सेक्टर है। टाउनशिप बनाने के लिए बड़ी संख्या में मजदूरों की जरूरत होती है। निर्माण सामग्री बनाने वालों को भी रोजगार मिलता है। प्रस्ताव देने वाली कंपनियों से करेंगे बैठक इस सेक्टर में स्वर्ण मुखी रिक्रिएशन एंड हॉस्पिटलिटी प्राइवेट लिमिटेड, अलयोला इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, अमलतास होटल्स प्राइवेट लिमिटेड, अध्यात्म ग्राम ओंकारेश्वर, ओमनी ग्रुप, शैंकी एस, फीलडे रूम्स एंड होटल्स, ट्रेजर ग्रुप, ईआईएच लिमिटेड और दैनिक भास्कर ग्रुप ने निवेश की इच्छा जताई है। इस सेक्टर में 68 हजार करोड़ के प्रपोजल सरकार को मिले हैं। पर्यटन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, जिन कंपनियों ने प्रस्ताव दिए हैं उन्हें बुलाकर पहले ये समझा जाएगा कि वे जिस जगह अपना प्रोजेक्ट लगाना चाहते हैं? वहां जमीन की उपलब्धता है या नहीं? इसको लेकर अलग-अलग बैठकें की जाएंगी। सारी अनुमतियां मिलने के बाद ये कंपनी पर निर्भर करता है कि वह कितने समय में अपना प्रोजेक्ट पूरा कर लेती है। वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, ऐसे प्रोजेक्ट में अधिकतम 5 साल का समय पर्याप्त होता है। करार पहले ही हो जाते हैं इस सेक्टर में हेक्सा क्लाइमेट सॉल्यूशन्स प्राइवेट लिमिटेड, ओरियाना पावर लिमिटेड, मैक्लेक, डीसीओ रिन्यूएबल एनर्जी इंडिया लिमिटेड, एएमपीआईएन ऊर्जा संक्रमण, भास्कर सोलर टेक प्राइवेट लिमिटेड ने निवेश की इच्छा जताई है। कुल 1.47 लाख करोड़ के इन्वेस्टमेंट के करार हुए हैं। उद्योग विभाग के रिटायर्ड एडिशनल डायरेक्टर अजय चौबे कहते हैं कि एनर्जी सेक्टर के प्रोजेक्ट में अधिकतम 5 साल का समय लगता है। इनसे जो करार होता है, उसमें पहले ही तय हो जाता है कि कितनी बिजली का उत्पादन होगा और सरकार कितनी बिजली खरीदेगी। ऐसे में जो भी कंपनियां निवेश की इच्छुक होती हैं, वो जमीन मिलने के बाद कंस्ट्रक्शन शुरू कर देती हैं। जो भी समय लगता है, वो कंस्ट्रक्शन और मशीनरी इंस्टॉल करने पर लगता है। माइनिंग के लिए कई अनुमतियों की जरूरत माइनिंग सेक्टर में अडाणी ग्रुप, गोल्डक्रेस्ट सीमेंट प्राइवेट, ऑरो कोल प्राइवेट लिमिटेड, आदित्य बिड़ला, अल्ट्राटेक सीमेंट, साटक्स वर्क्स प्राइवेट लिमिटेड, सारदा एनर्जी एंड मिनरल्स, जेके सीमेंट, प्राइम 4 फोर इंस्पेक्शन एलएलसी, रेकन केमिकल्स, बिड़ला कार्पोरेशन लिमिटेड और रामदास वर्मा एंड कंपनी ने इन्वेस्टमेंट की रुचि दिखाई है। एक्सपर्ट का कहना है कि माइनिंग के प्रोजेक्ट पूरे होने में 5 साल का वक्त लगता है। उद्योग विभाग के रिटायर्ड एडिशनल डायरेक्टर कहते हैं कि माइनिंग के दो तरह के प्रोजेक्ट होते हैं। यदि कोई माइनिंग से रॉ मटेरियल निकाल रहा है तो उसे शुरू होने में ज्यादा समय नहीं लगता। यदि कोई इन्वेस्टर्स रॉ मटेरियल की प्रोसेसिंग यूनिट लगाता है तो इसमें ज्यादा समय लगता है। वे कहते हैं- जो कंपनियां प्रपोजल देती हैं, वो अपना पूरा प्रोजेक्ट पहले से तैयार कर लेती हैं। बड़ी कंपनियां इन्वेस्टमेंट से पहले सारी एक्सरसाइज कर लेती है, ताकि निवेश के बाद जल्दी रिटर्न मिलें। उद्योगपति सरकार से निगोशिएशन करते हैं इस सेक्टर में सेकलिंक रिन्यूएबल्स प्राइवेट लिमिटेड, ओनिक्स रिन्यूएबल लिमिटेड, बाल्फोर बीटी पीएलसी, पुर्नजागरण सौर और इलेक्ट्रॉनिक सामग्री प्राइवेट लिमिटेड, सात्विक सोलर इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड, अक्षत ग्रीनटेक प्राइवेट लिमिटेड जैसी 12 कंपनियों ने निवेश की इच्छा जताई है। इस सेक्टर में 8.61 लाख करोड़ के प्रस्ताव मिले हैं। उद्योग विभाग के रिटायर्ड एडिशनल डायरेक्टर अजय चौबे कहते हैं कि यदि कोई 5 हजार करोड़ का इन्वेस्टमेंट कर रहा है तो वह पहले देखेगा कि उसे सरकार की तरफ से क्या सुविधाएं मिल रही हैं? वहीं, सरकार देखती है कि इस इन्वेस्टमेंट से उस क्षेत्र को कितना फायदा मिलेगा, कितना रोजगार जनरेट होगा? सरकार की पॉलिसी इन्वेस्टर्स के लिए मोटिवेशन का काम करती है। पीथमपुर औद्योगिक संगठन के अध्यक्ष गौतम कोठारी कहते हैं कि आज की तारीख में उद्योगों के लिए बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करना ज्यादा मुश्किल काम नहीं है। ऐसी तकनीक आ चुकी है, जिससे एक साल में ही इमारत बनकर तैयार हो जाती है। वे कहते हैं कि यदि सीरियस इन्वेस्टमेंट है और सरकार भी इन्वेस्टर्स को अगले 6 महीने में जमीन दे देती है तो फिर उद्योग लगना ज्यादा मुश्किल काम नहीं है। इन्वेस्टर का प्रोजेक्ट पहले से तैयार रहता है। यदि कोई सीरियस इन्वेस्टमेंट नहीं है तो वो ही हाल होगा, जो पहले की इन्वेस्टर्स समिट में हुए करारों का हुआ है। मेडिकल और हेल्थ प्रोजेक्ट का काम चरणों में होता है इस सेक्टर में भोपाल की जेवीपीडी डायग्नोस्टिक्स इंडिया, सिद्धार्थ कपूर वेंचर्स, इंदौर की इंडो यूरोपियन रिसर्च एंड हेल्थकेयर, इंडेक्स सिटी हॉस्पिटल, अल्फा लेबोरेटरीज, रूसन फॉर्मा ने निवेश की इच्छा जताई है। साथ ही जबलपुर के सुखसागर अस्पताल और रीवा की वाईजेईन हेल्थकेयर प्राइवेट लिमिटेड भी निवेश की इच्छुक है। पीथमपुर औद्योगिक संगठन के अध्यक्ष गौतम कोठारी कहते हैं कि हेल्थ सेक्टर का काम चरणों में होता है। इनमें से कई प्रस्तावों पर काम दो या तीन चरणों में होगा। ऐसे में इन्हें जमीन पर उतरने में पांच साल का वक्त लगने की उम्मीद है। रोजगार भी स्पेशलाइज्ड व्यक्तियों को मिलता है। ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट से जुड़ी ये खबर भी पढे़ं… इन्वेस्टर्स समिट में इंदौर से ज्यादा भोपाल, उज्जैन में निवेश भोपाल में दो दिन तक चली ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में सबसे ज्यादा 5.82 लाख करोड़ रुपए के निवेश प्रस्ताव भोपाल संभाग को मिले हैं। निवेश के मामले में इंडस्ट्रियलिस्ट की पहली पसंद रहने वाला इंदौर इस बार उज्जैन से भी पिछड़ता दिख रहा है। उज्जैन में 4.77 लाख करोड़ के प्रस्ताव आए हैं, जबकि इंदौर में 4.76 लाख करोड़ के प्रस्ताव हैं। नर्मदापुरम में 2.93 लाख करोड़ रुपए के निवेश प्रस्ताव मिले हैं। पढ़ें पूरी खबर… Post navigation तापमान के उतार-चढ़ाव से बिगड़ रही लोगों की 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