IMG 20250816 WA0001

पुतिन के सामने ट्रंप की टूटी हेकड़ी! पुतिन ने ट्रंप को दिखाई उनके ही अंदाज में हकीकत बोले किसी भी दवाब में नहीं होगा सीजफायर ढाई घंटे तक ट्रंप के मानने के बाद भी नहीं टूटे पुतिन

अलास्का में दिखी पुतिन की हनक, सबके सामने तोड़ डाला अमेरिकी प्रोटोकॉल; देखते रह गए ट्रंप

ट्रंप और पुतिन की मीटिंग के बाद कच्चे तेल की कीमतों में करीब 2 फीसदी की गिरावट.

कच्चे तेल की कीमतों में कमी आने से करीब 100 देशों को बड़ी राहत मिलने की संभावना है.

अमेरिका और रूस के बीच लंबे समय बाद हुई उच्च स्तरीय मुलाकात से दुनिया को उम्मीद थी कि शायद यूक्रेन युद्ध के मोर्चे पर कुछ ठोस समाधान निकल सकेगा. लेकिन अलास्का में अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच करीब 3 घंटे चली इस अहम बैठक के बाद भी किसी ठोस सीजफायर समझौते की घोषणा नहीं हुई.

इस बैठक में सीजफायर को लेकर सहमति क्यों नहीं बन पाई? इसके पीछे 5 अहम वजहें मानी जा रही हैं:

यूक्रेन पर पुतिन का अडिग रवैया

रूस के राष्ट्रपति पुतिन की यूक्रेन को लेकर सोच बिल्कुल स्पष्ट और कठोर है. 2022 में यूक्रेन पर आक्रमण का आदेश देकर उन्होंने यह दिखा दिया था कि वे यूक्रेन को फिर से रूस के प्रभाव क्षेत्र में लाना चाहते हैं. हालांकि युद्ध के तीन सालों में यूक्रेनी सरकार को हटाने में वे सफल नहीं हो पाए, लेकिन अब भी रूस ने करीब 22% यूक्रेनी इलाका अपने कब्जे में ले लिया है. पुतिन का मानना है कि यूक्रेन एक कृत्रिम राष्ट्र है, जिसकी नींव 1917 की रूसी क्रांति के बाद पड़ी थी.

हालांकि पुतिन ने दावा किया कि बातचीत सकारात्मक माहौल में हुई, लेकिन अमेरिकी मीडिया हाउस फॉक्स न्यूज ने इसे एक “तनावपूर्ण” बैठक बताया. उनके अनुसार, ट्रंप और पुतिन के बीच कई मुद्दों पर तीखी बहस भी हुई. पुतिन ने यह ज़रूर कहा कि यूक्रेन की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए, लेकिन असल में वह रूस के हितों को पहले रखने की रणनीति से हटने को तैयार नहीं दिखे.

सीजफायर भी पुतिन की शर्तों पर ही

पुतिन चाहते हैं कि अगर युद्ध रुके तो उनकी शर्तों पर. उनका कहना है कि यूक्रेन को न केवल नाटो से दूरी बनाए रखनी होगी, बल्कि भविष्य में रूस की सुरक्षा के लिए भी उसकी विदेश और रक्षा नीति पर मास्को का नियंत्रण होना चाहिए. साथ ही वे पश्चिमी देशों से प्रतिबंध हटाने और जब्त की गई रूसी संपत्ति वापस देने की मांग भी कर रहे हैं. जाहिर है, इन मांगों को अमेरिका जैसी ताकत यूं ही नहीं मान सकती.