‘शोले-सिर्फ-फिल्म-नहीं,-मेरी-पाठशाला-थी’:सचिन-पिलगांवकर-बोले-जमीन-पर-बैठकर-रमेश-सिप्पी-को-ऑब्जर्व-करता-था,-अब-तक-23-फिल्में-बना-चुका-हूं

एक्टर और निर्देशक सचिन पिलगांवकर ने फिल्म शोले के 50 साल पूरे होने पर दैनिक भास्कर से खास बातचीत की। उन्होंने कहा ‘शोले’ जैसी फिल्म एक ही बार बन सकती है। इसका रीमेक मुमकिन नहीं है। आज इस महान फिल्म को रिलीज हुए 50 साल पूरे हो गए हैं, लेकिन इसकी कहानी, संवाद और भावनाएं आज भी उतनी ही ताजा लगती हैं। मुझे पूरा यकीन है कि आने वाले 50 सालों में भी यह फिल्म उतनी ही प्रभावशाली और जीवंत बनी रहेगी। आज भी ‘शोले’ का जिक्र हर जगह होता है। ‘शोले’ अमर है और अमर ही रहेगी। ‘शोले’ फिल्म का ऑफर आया, तब मैं 16 साल का था मेरी पहली मुलाकात रमेश सिप्पी जी से साल 1966 में हुई थी, जब मैंने उनकी फिल्म ‘ब्रह्मचारी’ में एक इमोशनल बच्चे का किरदार निभाया था। इसके बाद साल 1973 में मुझे सिप्पी फिल्म्स से एक कॉल आया। उस समय मेरी उम्र 16 साल थी। मैं उस दौर में न पूरी तरह चाइल्ड आर्टिस्ट था, न ही एडल्ट एक्टर। मैं अपने पिता के साथ मुंबई के खार इलाके में स्थित रमेश जी के ऑफिस गया। वहां जाकर पता चला कि वे ‘शोले’ फिल्म बना रहे हैं। मुझे देखते ही वे बहुत खुश हो गए और कहने लगे कि मैं देखना चाहता था कि अब तुम कैसे दिखते हो। उन्होंने बताया कि जैसे ‘ब्रह्मचारी’ में एक इमोशनल बच्चे का रोल था, वैसे ही ‘शोले’ में भी अहमद नामक एक टीनएज लड़के का भावनात्मक किरदार है। अहमद इमाम साहब का बेटा होता है। वह नौकरी के सिलसिले में बाहर जाता है। तभी डाकू गब्बर सिंह के आदमी उसे पकड़कर गब्बर के पास ले जाते हैं। गब्बर अहमद की हत्या कर देता है और उसकी लाश गांव भेज दी जाती है। जब लाश गांव पहुंचती है, तो पूरा गांव हिल जाता है। यह फिल्म का टर्निंग प्वाइंट होता है। इस घटना से गांव जय और वीरू के खिलाफ हो जाता है। लेकिन आगे चलकर इमाम साहब की वजह से पूरा गांव एक बार फिर उनके समर्थन में आ जाता है। रमेश जी ने जब मुझे यह किरदार सुनाया, तो उन्होंने मेरी राय पूछी। मैंने बिना झिझक कहा आपके साथ काम करना मेरे लिए बहुत खुशी की बात होगी। जमीन पर बैठकर रमेश जी को ऑब्जर्व करता था ‘शोले’ करने से पहले मैं लगभग 65 फिल्मों में बतौर बाल कलाकार काम कर चुका था। लेकिन ‘शोले’ के सेट पर मैंने जो अनुभव किया, वह बिल्कुल अलग था। जिस मेहनत, समर्पण और पेशेवर अंदाज में रमेश सिप्पी जी काम कर रहे थे, वह देख कर मैं गहराई से प्रभावित हुआ। वो अक्सर कुर्सी पर बैठकर डायरेक्शन किया करते थे और मैं उनके पीछे जमीन पर बैठकर उन्हें चुपचाप ऑब्जर्व करता था। उनका काम करने का तरीका, सीन की बारीकियों पर ध्यान और कलाकारों से बातचीत। जब मेरा पहला शेड्यूल पूरा हुआ, तो मुझे बेंगलुरु से वापस मुंबई लौटना था। लेकिन मैं और रुकना चाहता था। मैंने उनके मैनेजर्स, प्रेम और राजन से विनती की कि क्या मुझे दो-तीन दिन और रुकने की अनुमति मिल सकती है। जब उन्होंने रमेश जी से बात की, तो उन्होंने कहा कि अगर वह रुकना चाहता है, तो रुकने दो। मुझे पता है वह क्यों रुकना चाहता है। जब मैनेजर ने मुझे यह बात बताई, तो मैं चौंक गया। सोचने लगा रमेश जी को कैसे पता चला कि मैं क्यों रुकना चाहता हूं? एक दिन जब मैं हमेशा की तरह पीछे जमीन पर बैठा था, तो रमेश जी ने पूछा, पीछे क्यों बैठे हो? पास में कुर्सी डालकर बैठो। मैंने कहा कि मैं यहीं ठीक हूं। अगले दिन उन्होंने मुझसे सीधा सवाल किया, क्या सीखने की कोशिश कर रहे हो? जिंदगी में क्या करना चाहते हो? मैंने जवाब दिया कि मेरा सपना है कि एक दिन निर्देशक बनूं। यह सुनकर वे मुस्कुराए और बोले बहुत अच्छी बात है। पर डायरेक्शन से जुड़ी चीजें सीखी हैं? मैंने उन्हें बताया कि मैंने ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म ‘मछली’ में काम किया है और उनके कहने पर मैंने करीब ढाई साल तक एडिटिंग रूम में असिस्ट भी किया है। यह सुनकर रमेश जी बहुत खुश हुए। शायद उन्होंने उस दिन मेरे भीतर के निर्देशक को पहचान लिया था। रमेश जी और ऋषि दा से जो कुछ सीखा, वह मेरे बहुत काम आया जब मैं ‘शोले’ के दूसरे शेड्यूल के लिए बेंगलुरु पहुंचा, तो रमेश सिप्पी जी ने मुझसे कहा, सचिन मैं सेकंड यूनिट बना रहा हूं। उन्होंने बताया कि इस यूनिट से उन्हें ऐसे शॉट्स की जरूरत है जिनमें मुख्य कलाकार तो नहीं होंगे, लेकिन इनमें एक्शन सीक्वेंस, लॉन्ग शॉट्स, डुप्लीकेट शॉट्स, ट्रेन पासिंग, और डाकुओं के कुछ दृश्य शामिल होंगे। इसमें एक्शन डायरेक्टर, टेक्निकल टीम और विदेश से आए एक एक्शन डायरेक्टर भी शामिल होने वाले थे। रमेश जी ने आगे कहा कि वे खुद इन सीन्स की शूटिंग के दौरान मौके पर मौजूद नहीं रह पाएंगे, इसलिए उन्हें ऐसे कम से कम दो लोग चाहिए जो वहां पर उनकी ओर से मौजूद रहें। शूटिंग को ध्यान से देखें और उन्हें आकर बताएं कि वहां क्या हो रहा है। डायरेक्शन की जिम्मेदारी उन प्रोफेशनल्स को दी गई थी, जिन्हें रमेश जी ने खासतौर पर इस काम के लिए हायर किया था। हमारा काम सिर्फ ऑब्जर्व करना था, ना हमें कुछ डायरेक्ट करना था, ना ही हमने किया। जब रमेश जी ने मुझे यह जिम्मेदारी सौंपी, तो मैं बहुत खुश हुआ। एक ओर गर्व महसूस हुआ, तो दूसरी ओर थोड़ा अचरज भी हुआ कि 16-17 साल के एक लड़के पर उन्होंने इतना भरोसा जताया। यह मेरे करियर का बेहद अहम मोड़ था। आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं, तो पाता हूं कि वो अनुभव मेरे लिए कितने मूल्यवान थे। बतौर निर्देशक मैं अब तक 23 फिल्में बना चुका हूं और हर एक फिल्म में रमेश सिप्पी जी और ऋषिकेश मुखर्जी दा से सीखी गई बातें मेरे बहुत काम आईं। मेरा मानना है कि हर दिन सीखने का दिन होता है। रमेश जी ने मेरे शुरुआती सफर में जो समर्थन और भरोसा दिया, उसके लिए मैं हमेशा उनका आभारी रहूंगा। ‘शोले’ से पैसे नहीं लिए, तब रमेश जी ने एसी गिफ्ट कर दिया जब ‘शोले’ की शूटिंग पूरी हुई, तो प्रोडक्शन मैनेजर ने मुझसे कहा कि तुमने इस फिल्म के लिए कोई फीस नहीं ली है। हम तुम्हें पैसे देना चाहते हैं। मैंने मुस्कुराकर जवाब दिया इस फिल्म में काम करने का जो अनुभव और सीख मुझे मिली है, वही मेरे लिए सबसे बड़ी कमाई है। मैं इस फिल्म के लिए पैसे नहीं लूंगा। जब ये बात रमेश सिप्पी जी को पता चली, तो उन्होंने मुझे एक एयर कंडीशनर गिफ्ट किया। साल 1975 में वह मेरे कमरे में लगा पहला एसी था। उस समय घर में एसी होना अपने आप में एक बड़ी बात मानी जाती थी। धीरे-धीरे मुझे एसी की आदत लग गई इतनी कि आज भी बिना एसी के नींद नहीं आती, पर असल में उस एसी की ठंडक के साथ-साथ रमेश जी के आशीर्वाद की जो गर्माहट मेरे भीतर बसी है, वह आज भी मेरे साथ है उतनी ही ताजा और प्रेरणादायक।