पांच दशक बाद भी आइकोनिक फिल्म ‘शोले’ की चर्चा लोगों के बीच होती है। फिल्म के न सिर्फ छोटे-बड़े किरदार और उनके डायलॉग चर्चित हैं, बल्कि इसमें काम करने वाले कलाकारों की अपनी रोचक कहानियां है। शोले ने आज रिलीज के 50 साल पूरे कर लिए हैं। फिल्म ‘शोले’ दो अपराधियों वीरू (धर्मेंद्र) और जय (अमिताभ बच्चन) की कहानी है, जिन्हें एक रिटायर्ड पुलिस ऑफिसर (संजीव कुमार) खूंखार डाकू गब्बर सिंह (अमजद खान) को पकड़ने के लिए रखता है। फिल्म में हेमा मालिनी ने बसंती और जया बच्चन ने राधा का किरदार निभाया। हाल ही में हेमा मालिनी ने दैनिक भास्कर से बातचीत में फिल्म को लेकर कई दिलचस्प बातें शेयर कीं। सवाल: फिल्म ‘शोले’ रिलीज के बाद शुरू में दर्शकों का रिएक्शन कैसा था? जवाब: ‘शोले’ एक आइकॉनिक फिल्म थी, वह बन गई, लेकिन रिलीज के वक्त ऐसा नहीं था। इसके रिलीज होने के 20 दिन में जो आगे-पीछे चेंज ओवर हुआ, वह कमाल का था। दो इंटरवल के साथ पिक्चर बहुत लंबी-चौड़ी बनी थी। फिल्म देखकर लोग चुप थे। नार्मली फिल्म देखने के बाद थिएटर में लोग चिल्ला-चिली, हा-हू करते हैं, वाह क्या बात है आदि। इस पिक्चर को देखने के बाद कोई कुछ भी बोल नहीं रहा था। लोगों का रिएक्शन देखकर रमेश सिप्पी जरा परेशान थे कि पता नहीं फिल्म लंबी है, शायद इसलिए लोगों को पसंद नहीं आ रही है। उन्होंने कहा था कि काफी सीन्स काटने वाला हूं, ऐसा कहकर कुछ सीन काट भी दिया। उन्हें लगा कि अब फिल्म चलेगी, लेकिन इसके बाद एकदम उल्टा हो गया। लोग एकदम झगड़ा करने लग गए। पब्लिक पूछने लगी कि फिल्म में यह सीन था, वह सीन था, वह सब कहां है, क्यों काट दिया? फिर हम फिल्म से जुड़े लोगों को समझ में आया कि पब्लिक इसको पसंद कर रही है। काटे हुए सारे सीन दोबारा जोड़े गए। पिक्चर देखने को ऐसी रिपीट वैल्यू होने लगी कि सब लोग दंग रह गए। आज तक ऐसा किसी फिल्म के साथ नहीं हुआ। इस फिल्म की शुरुआत ही ऐसी हुई थी। सवाल: जब फिल्म में आपको ‘बसंती’ का रोल ऑफर हुआ, तो आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या थी? जवाब: पिक्चर साइन करने से पहले डायरेक्टर रमेश सिप्पी ने मुझे कहानी सुनाई और किरदार ‘बसंती’ के बारे में बताया। तब मैंने कहा कि ये तो बहुत छोटा-सा रोल है, इसमें मैं क्या करूंगी? आपने तो मेरे साथ ‘सीता और गीता’ बनाई है। वह फिल्म करने के बाद ऐसा लग रहा है कि इसमें मेरा कुछ रोल ही नहीं है। मैं बार-बार यही कह रही थी, लेकिन उन्होंने समझाया कि ऐसा बिल्कुल नहीं है। पिक्चर रिलीज होने के बाद देखना तुम्हारा रोल इतना हाइलाइट होगा कि तुम्हें खुद अंदाजा नहीं होगा। बस ‘हां’ कहो और यह फिल्म करो। इस पिक्चर को मना मत करना। रमेश सिप्पी मेरे बहुत अच्छे दोस्त थे, इसलिए एक वक्त बाद मैंने सोचा, “चलो, कर लेती हूं।” मैंने फिल्म के लिए ‘हां’ कह दिया। पिक्चर करने के बाद मुझे एहसास हुआ कि मैंने कितना अच्छा काम किया है। अच्छा हुआ कि मैंने बसंती का रोल स्वीकार किया। अगर नहीं करती तो आज के दिन पछताती, क्योंकि यह रोल बेहतरीन था और कोई और भी कर सकता था। बसंती कोई भी हीरोइन बन सकती थी, लेकिन मेरे नसीब में लिखा था कि “बसंती” सिर्फ हेमा मालिनी बने और “हेमा मालिनी” ही बसंती हो। सवाल: गाने ‘हा जब तक है जान…’ की शूटिंग का अनुभव आपके लिए कैसा रहा? जवाब: गाना ‘हां जब तक है जान, जाने जहां मैं नाचूंगी’ पर मैंने जो डांस किया, उसका कोई रिहर्सल वगैरह नहीं की थी। इसे सीधे बैंगलोर में सेट पर जाकर शूट किया। मैं पहले ही रमेश सिप्पी से कह रही थी कि मई महीने में गाना शूट कर रहे हो, तो बहुत गर्मी होगी। गर्मी में डांस करना बड़ा तकलीफदेह होगा, सिर में दर्द हो जाएगा। आप इसका शूटिंग शेड्यूल मई के बजाय नवंबर-दिसंबर महीने में रखिए, तो अच्छा रहेगा। उन्होंने कहा- “बिल्कुल नहीं। मुझे तो इसे गर्मी के मौसम में ही शूट करना है। डांस करते समय आपके चेहरे पर तकलीफ साफ दिखनी चाहिए, इसलिए इसकी शूटिंग मई में ही होगी।” मई की तपती गर्मी में इस गाने की लगातार 15 दिनों तक शूटिंग हुई, जो काफी मुश्किल रही। लेकिन रिजल्ट भी बड़ा अच्छा आया। दरअसल, रमेश सिप्पी इस गाने की शूटिंग खास तौर पर एक पर्टिकुलर समय में ही करते थे। हम मेकअप वगैरह करके तैयार बैठे रहते थे, लेकिन जब 12 बजे कड़ाके की धूप सिर के ऊपर आती थी, तभी उस धूप में वे शूटिंग करवाते थे। सवाल: ‘शोले’ की शूटिंग शेड्यूल और लोकेशन को लेकर आपका अनुभव कैसा रहा? जवाब: सबके अलग-अलग कैरेक्टर थे, इसलिए सबकी शूटिंग अलग-अलग समय पर होती थी। मेरा अलग, धरम जी का अलग, किसी और का अलग समय पर शूट होता था। कभी-कभी किसी सीन में हम सब एक साथ होते थे, वर्ना शूटिंग के दौरान किसी भी सीन में एक साथ नहीं थे। फिल्म का पूरा सेट बैंगलोर में लगा था। हमने एक भी सीन स्टूडियो के अंदर नहीं किया, सारी शूटिंग बैंगलोर में ही हुई। फिल्म बनाने में एक साल का वक्त लगा। हमारी महीने में 5 से 10 दिन शूटिंग होती थी। मेरे 10 दिन की शूटिंग होने के बाद दूसरा आर्टिस्ट आता था, फिर उसकी शूटिंग होती थी। ऐसा सिलसिला लगातार साल भर चलता रहा। वहां टेक्नीशियन, लाइटमैन, स्पॉट बॉय, असिस्टेंट डायरेक्टर, डायरेक्शन डिपार्टमेंट, आर्ट डिपार्टमेंट, फाइट मास्टर आदि सभी लोग स्थायी तौर पर वहीं रहते थे। इसमें डाकू और ट्रेन सीक्वेंस था, इसलिए बैंगलोर और उसके आसपास के गांव में शूटिंग होती रहती थी। सवाल: क्या ‘बसंती’ का किरदार आपके लिए खास था? जवाब: मैंने लगभग 200 फिल्मों में काम किया। अलग-अलग किरदार निभाए, तरह-तरह के गाने किए, लेकिन ‘शोले’ और ‘सीता और गीता’ को लोग आज भी याद रखते हैं। दर्शकों को पर्दे पर चंचल और खुशमिजाज लड़कियां पसंद आती हैं। यहां बसंती गांव की लड़की थी, एक आत्मनिर्भर लड़की। पीएम मोदी जी कहते हैं कि सभी लड़कियों को आत्मनिर्भर होना चाहिए, लेकिन 50 साल पहले तांगे वाली बसंती यह करके दिखा चुकी थी। वह अकेले अपना तांगा चलाकर जीवन-यापन करती थी। ऊपर से वह शहर की नहीं, बल्कि गांव की लड़की थी। बहुत हिम्मत वाली थी। इससे पहले ऐसा कौन करता था? आज के जमाने में लड़कियां इंडिपेंडेंट हैं, लेकिन 50 साल पहले तांगे वाली बसंती आत्मनिर्भर लड़कियों की रोल मॉडल थी। सवाल: आपके हिसाब से ‘शोले’ की सफलता का कारण क्या था? जवाब: यह फिल्म इसलिए चली क्योंकि इसकी कहानी और स्क्रीनप्ले बेहतरीन थे। डायलॉग और गाने भी बहुत अच्छे थे। परफॉर्मेंस परफेक्ट था, क्योंकि फिल्म में सही कलाकारों को कास्ट किया गया था। जो भी रोल दिया गया, वह बिल्कुल सटीक बैठा। इसमें किसी किरदार में किसी और को सोच भी नहीं सकते। सारे रोल टेलर-मेड थे। 50 साल बाद भी इसे चर्चा में बनाए रखने के लिए दर्शकों का धन्यवाद! 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