केवल गौ-शाला बनाकर गौ-संवर्धन और संरक्षण नहीं किया जा सकता है। इस दिशा में किए जा रहे प्रयास तभी संभव होंगे। जब गोशालाओं को मल्टीलेयर फॉर्मिंग से जोड़ा जाएगा। इसमें वैदिक कृषि, जैविक खाद और बायोगैस उत्पादन जैसे कई आयाम शामिल करने होंगे और इन पर सतत ध्यान भी देना होगा। ये बात अंतरराष्ट्रीय संस्था इस्कॉन के कृषि विभाग व गौ-संरक्षण जीबीसी के प्रमुख कालाकंठ दास से दैनिक भास्कर ने खास बातचीत में कही। बता दें कि मोहन सरकार गौ-संवर्धन और संरक्षण के क्षेत्र में बड़े निर्णय ले रही है। सरकार भारतीय नववर्ष को गौ-वंश रक्षा वर्ष के रूप में मनाने, गाय के चारे की राशि 20 से बढ़ाकर 40 रुपए दिन करने, नई गौशालाएं बनाने के फैसले ले चुकी है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव प्रदेश की जनता से गाय पालन की अपील भी कर चुके हैं। राजधानी के कोलार उप नगर में रविवार को इस्कॉन मंदिर की बुनियाद रखी गई है। इस परिसर में गाय पाली जाएंगी और मंदिर से जुड़े भक्त रहेंगे भी। यह इस्कॉन संस्था का देश का पहला गौ संरक्षण प्रोजेक्ट है। जिसे मॉडल की तरह तैयार किया जाएगा। उन्होंने कहा कि किसानों को वैदिक कृषि के लिए प्रोत्साहित करना पड़ेगा, शिक्षा देनी पड़ेगी, ताकि वे प्राकृतिक और जैविक खेती को अपना सकें। मल्टीलेयर फॉर्मिंग से खेती को अधिक समृद्ध बनाया जा सकता है, जिससे गायों के लिए पोषक चारा और प्राकृतिक भोजन उपलब्ध होगा। वे कहते हैं कि प्रभुपाद सक्रिय और जीवित गौ संरक्षण मॉडल चाहते थे। इसमें दिखावा नहीं असल काम चाहते थे। वह चाहते थे कि गायों की तादात बढ़े। गायों से हमें घी, गोधन, पंचगव्य जैसी सामग्री मिले। कुल मिलाकर ये पवित्र मॉडल है। ये मॉडल हमारी सेहत, बायो कंस्ट्रक्शन में मददगार है। वे मानते थे कि गाय और खेती सात्विकता का आधार है। उन्होंने आगे कहा कि गौशालाएं ऐसी हों, जिनमें गायों के लिए पर्याप्त चारा हो। उनका इलाज करने के लिए डॉक्टर हों। गाय सिर्फ दूध देने का साधन नहीं, बल्कि संपूर्ण जैविक कृषि की रीढ़ है। अगर सरकार गौ-आधारित कृषि को बढ़ावा देती है, तो इससे न सिर्फ किसानों की आमदनी बढ़ेगी, बल्कि पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा।
कालाकंठ दास ने दिए प्रश्नों के उत्तर प्रश्नः मंदिर की आधारशिला रखते हुए सीएम ने कई घोषणाएं कीं, आप क्या कहते हैं?
उत्तर : सीएम ने कृषि को बढ़ाने की बात कही। हमारे समाज को ऐसे ही नेताओं की जरूरत है। जो स्प्रीचुअल होते हुए सामाजिक उत्थान के लिए काम करते रहें। इसके लिए इस्कॉन सरकार को ऐसे मॉडल उपलब्ध करा सकता है। हमारे मॉडल में लोग कृषि को दिल से अपनाएंगे, छोड़ेंगे नहीं। इस्कॉन किसानों के हृदय में बदलाव लाने के लिए काम करने को तैयार है। इससे खेतों में जीवन आएगा न कि आईटी विभाग बनाने से। प्रश्नः इस्कॉन में आपकी क्या जिम्मेदारियां हैं, आप किन प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं।
1965 में इस्कॉन की शुरुआत हुई। संस्थापकाचार्य श्रील प्रभुपाद शुद्ध कृष्ण भक्ति देने भारत से विदेश गए। उनका प्लान था कि वे विदेशियों को भारत लाएं,क्योंकि ग्रीन कार्ड के लिए भारतीय विदेश जाते थे। वे अमेरिकन को भारत में धोती पहनाकर लाए। फिर इस प्रोजेक्ट ने पिक किया और देखिए पूरी दुनिया में लोग कृष्ण भक्ति में डूब गए। प्रभुपाद का विजन था कि हर मंदिर में खेती होनी चाहिए। गाय होनी चाहिए। ताकि इन खेतों से राधा कृष्ण के विग्रहो के लिए शुद्ध भोग बनाए जा सकें। लोगों को शुद्ध आहार मिले। ये मंदिर समाज के लिए एक रोल मॉडल बनें। आपने देखा हो कि इस्कॉन में एक या दो विग्रह होते हैं, लेकिन हम पूजा अर्चना के स्तर को बेहद हाई रखते हैं।
प्रभुपाद ने विग्रह सेवा के स्तर को भारत में काफी ऊंचा किया है। उनका अगला उपदेश और लक्ष्य मंदिरों के माध्यम से फार्म यानी खेती पर आधारित समाज को बनाने का था। वे चाहते थे कि हम यहां छोटा सफल मॉडल लोगों को दिखाएं ताकि बाहर के लोग इससे मोटिवेट हों। प्रश्नः आप गृहस्थ हैं या ब्रह्मचारी, इस्कॉन से कैसे जुड़े ?
जी मैं एक गृहस्थ हूं। मेरा परिवार भी है। मेरी पत्नी और दो बेटियां भी हैं। मैं पिछले 12 साल से भारत में रह रहा हूं। इससे पहले मैं कैम्ब्रिज में ही एग्रीकल्चर की पढ़ाई कर रहा था। तब मेरे पिताजी ने पूछा कि आप प्रैक्टिकल के लिए कहां जाना चाहेंगे ब्राजील या इंडिया तो मैंने इंडिया को चुना। भारत बहुत ही सुंदर देश है। 1980 में पहली बार भारत आया था। तब में टीएनजर था। पहली बार एक ज्योतिष मुझे वृंदावन के इस्कॉन टेंपल ले गया था। वहीं से मैं इस्कॉन के भक्तों के संपर्क में आया।