शहर के दो प्रमुख इलाकों जेके रोड और कोलार में आरसीसी की दो बड़ी रोड बन रही हैं। जेके रोड पर 20 करोड़ और कोलार रोड पर 200 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च किए जा रहे हैं। दोनों योजनाओं में हाल में ही ट्रैफिक शुरू हुआ है, इसी बीच जेके रोड एक तरफ ही डेढ़ किमी लंबाई में 70 से ज्यादा जगह टूट चुकी है। इसी तरह कोलार गेस्ट हाउस चौराहा से बैंक ऑफ इंडिया तिराहे तक एक तरफ 40 से ज्यादा जगह कोलार रोड टूट चुकी है। कई जगह तो क्रैक 10 रुपए के सिक्के से भी ज्यादा चौड़े हैं। इससे लोगों को गाड़ी चलाते समय जर्क महसूस हो रहे हैं। कई जगह सरफेस एक जैसा नहीं है। दोनों ही सड़काें पर साइनबोर्ड और स्ट्रीट लाइट नहीं लगी है और सेंट्रल वर्ज का काम अधूरा है। जेके रोड पर पूरी सड़क पर धूल बिखरी है तो कोलार रोड पर चूनाभट्‌टी और कोलार चौराहे पर काम अधूरा है। ऐसे में लोगों को समझ ही नहीं आता कि किस तरफ जाएं खास बात यह है कि ये दोनों प्रोजेक्ट पूरे भी नहीं हुए हैं। भास्कर के लिए मैनिट के ट्रैफिक एंड ट्रांसपोर्ट एक्सपर्ट डॉ. सिद्धार्थ रोकड़े ने दोनों प्रोजेक्ट का क्वालिटी ऑडिट किया। उनसे समझें तकनीकी पहलू। क्वालिटी ऑडिट… ज्वाइंट सील न करने और बेस सही न होने से चटकती है आरसीसी रोड एक्सपर्ट डॉ. रोकड़े ने बताईं दो बड़ी वजह 1. ज्वाइंट बनाना और उसे सील करना जरूरी
आरसीसी रोड टूटे न, ​इसलिए हर 4.5 मीटर पर ज्वाइंट बनाते हैं। यानी रोड बीच से काटकर इसमें एपॉक्सी मटेरियल (जोड़ने वाला ग्लू) डालते हैं। इससे ज्वाइंट सील हो जाता है। गर्मी में फैलने व ठंड में सिकुड़ने पर टूटती नहीं है। ज्वाइंट सील न करें तो इसमें धूल भर जाती है। दबाव बढ़ने पर ये ज्वाइंट के पास चटक जाती है। प्रेशर पड़ने पर बीच से भी टूट जाती है। 2. बेस में अगर खामी है तो रोड टूटेगी
आरसीसी रोड के लिए बेस बनाया जाता है। बेस की लोअर लेयर में कोई खामी होने पर रोड बीच से टूट जाती है। यह भी आड़ी और खड़े में टूटती है। सड़क पर ऐसे क्रैक हैं तो इन्हें भी एपॉक्सी मटेरियल से जोड़ना चाहिए। कॉन्क्रीटिंग के बाद चिकने सरफेस पर लाइनिंग होती है। फिर पानी डालते हंै। इसके 8 घंटे के अंदर ज्वाइंट कटना चाहिए। देरी हुई तो क्रैक आएंगे ही। स्ट्रक्चरल क्रैक नहीं होना चाहिए
डॉ. रोकड़े के अनुसार, आरसीसी पर स्ट्रक्चरल क्रैक नहीं होना चाहिए। इसका मतलब है रोड की थिकनेस के आधे हिस्से में क्रैक आना। इसकी जांच के लिए उस हिस्से को कटर से काटकर लैब में ले जाते हैं। उसकी जांच होती है। अभी ये ऊपर से दिख रहे हैं। इसलिए इनकी थिकनेस नहीं बताई जा सकती है। … और जिम्मेदारों की ये दलील
फाइनल करने के पहले पूरे रोड की पड़ताल होगी। जहां भी क्रैक हैं, वहां उनका स्लैब लेकर जांच की जाएगी। कहीं भी थिकनेस कम होने पर वहां एपॉक्सी मटेरियल से भरा जाएगा। तय मोटाई से ज्यादा दरार होने पर उस पूरे पैनल को बदलने के लिए कांट्रेक्टर को नोटिस दिए जाएंगे।
संजय मस्के,चीफ इंजीनियर पीडब्ल्यूडी