झाबुआ शहर से 11 किमी दूर रोटला ग्राम पंचायत है। जो यहां के एक तालाब और इसमें से निकलने वाली प्राचीन प्रतिमाओं के लिए प्रसिद्ध है। यहां मंदिर के पास स्कूल परिसर में गांव वालों ने एक ओटला बनाया है और जो भी प्रतिमाएं मिलती हैं, उन्हें इस पर रख देते हैं। डेढ़ दशक पहले प्रशासन ने यहां से प्रतिमाएं कलेक्ट्रेट ले जाकर रख दी। उसके बाद से अब तक कई अन्य प्रतिमाएं निकल चुकी हैं। किवदंती है कि सावन माता ने एक रात में यहां का तालाब बनाया था। उन्होंने रोटी बनाना शुरू की, लेकिन इतने में सुबह हो गई। सब कुछ पत्थर का हो गया। इनमें एक बड़ी रोटी भी है। बड़े आकार की पत्थर की रोटी की तरह दिखने वाली आकृति भी यहां है। कहा जाता है, इसी पत्थर की रोटी के आधार पर गांव का नाम रोटला हुआ। भीली बोली में रोटी को रोटला कहा जाता है। स्कूल परिसर में ओटले पर रखी प्रतिमाओं में पत्थर की घट्‌टी, परात, अन्य बर्तन, खाने के सामान और दूसरी वस्तुएं पत्थर की बनी रखी हुई हैं। देवताओं की प्रतिमाएं भी हैं। इनमें शिवलिंग, गणेशजी, हनुमानजी और अन्य देवताओं की प्रतिमाएं हैं। गांव के लोग अपने यहां हर शुभ काम के पहले इस ओटले पर धोक देने जाते हैं। आसपास के कई गांवाें के लोगों के यहां भी यही परंपरा है। बरात पर जाने के पहले दुल्हा भी पहुंचता है। पुजारी समरसिंह भूरिया ने बताया, कई बार यहां मंदिर निर्माण की मांग कर चुके हैं। यहां सरकार को पुरातत्व सर्वेक्षण से सर्वे भी कराकर तालाब की खुदाई करना चाहिए। खुदाई पर निकलती हैं प्रतिमाएं
गांव के नरवेसिंह भूरिया, कमलसिंह वास्केल, इंदरसिंह सिंगाड़िया ने बताया, गर्मियों में ये तालाब सूख जाता है। सूखते ही इसका उपयोग खेल मैदान की तरह लोग करते हैं। खेलते हुए लोगों को कई बार यहां से प्रतिमाएं मिल चुकी हैं। पहले तालाब पूरे साल भरा रहता था, लेकिन अब रबी की खेती बढ़ गई और आसपास के लोग मोटर से पानी खींच लेते हैं। ऐसे में जनवरी-फरवरी तक पानी खाली हो जाता है। मार्च आते ये खेल मैदान बन जाता है।